चिता के लिए लकड़ियां भी नहीं जुटा पाया परिवार:28 साल की अनुराधा पूरे परिवार के लिए कमाती थी, अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे

 

चिता के लिए लकड़ियां भी नहीं जुटा पाया परिवार:28 साल की अनुराधा पूरे परिवार के लिए कमाती थी, अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं थे


जिसकी वजह से घर का चूल्हा जल रहा था। जो पैसे कमाकर लाती थी तो मां की दवाइयां समय पर आती थीं। जो पूरे परिवार का फिक्र करती थी। उसी की मौत हुई तो घरवाले चिता के लिए लकड़ी तक नहीं जुटा पाए। तंगहाली ऐसी कि घर में इतनी रकम ही नहीं थी कि अंतिम संस्कार किया जा सके। बाद में समाज के लोग आगे आए और अंतिम संस्कार में मदद की। पूरे परिवार का खर्च चलाने वाली यह बेटी अब दुनिया में नहीं है। उसे हार्ट अटैक आया और सबको छोड़ गई। पूरे परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा है। बुजुर्ग मां-बाप, मंद बुद्धि भाई का खर्च अब कौन चलाएगा। दो वक्त की रोटी का इंतजाम अब कौन करेगा।


बैकपेन की वजह से 6 महीने से घर पर थी

शनिवार को 28 साल की अनुराधा की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। अनुराधा जयपुर में एक टेलीकॉम कंपनी में 10-12 हजार की मामूली नौकरी कर रही थी। पिछले 6 महीने से रीढ़ की हड्‌डी में दर्द के कारण वह काम पर नहीं जा पा रही थी। कोरोना काल में जब लॉकडाउन लगा तो जो कुछ जुड़ा था वह भी खर्च हो गया। हालात ये हो गए कि अनुराधा कमाती थी तो घर में राशन आता था। अनुराधा 6 महीने से बेरोजगार थी। जयपुर के जगतपुरा में वह पीजी में रह रही थी। किसी रिलेटिव ने बहुत कम खर्च में पीजी दिला दिया था। कुछ दिन से वह अलवर में अपने घर पर थी। शनिवार को दोपहर में अनुराधा को सीने में दर्द हुआ। घरवाले अनुराधा को जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। समाज के लोगों की मदद से दूसरे दिन रविवार को चंदा जुटाकर अनुराधा का अंतिम संस्कार किया गया। समाजसेवी हिमांशु शर्मा व अनिल यादव ने लकड़ियों का इंतजाम किया।


अनिल यादव ने लकड़ियों का इंतजाम किया।

28 साल की उम्र में अनुराधा की हार्ट अटैक से मौत हो गई।
28 साल की उम्र में अनुराधा की हार्ट अटैक से मौत हो गई।

परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही थी अनुराधा
अनुराधा 12वीं तक पढ़ी थी। भाई मेंटली वीक है। इसलिए परिवार के खर्च की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आई। 2015-16 में उसने अलवर में ही दक्ष अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी कर ली। इसके बाद छोटी-मोटी नौकरी करते हुए उसने परिवार का खर्च उठाया। जयपुर में वह टेलीकॉम कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव थी। पिछले 6 महीने से रीढ़ की हड्‌डी में दर्द की वजह से काम पर नहीं जा रही थी। पिता इस दौरान एक मेडिकल स्टोर पर 4-5 हजार की नौकरी कर रहे थे।


भाई को पेंशन मिलनी चाहिए
अनुराधा के रिश्तेदार अनिल का कहना है कि भाई मंदबुद्दि है। उसे पेंशन मिलनी चाहिए। ताकि परिवार का खर्च चल सके। ऐसे न जाने कितने परिवार हैं, जिनकी ऐसी ही कहानी है। सरकार को सर्वे कराकर कुछ न कुछ इंतजाम करना चाहिए।


समाज के प्रतिनिधि बोले
सिंधी समाज के प्रतिनिधि रमेश चंद्र ने बताया कि हमें काफी देर बाद पता लगा कि परिवार की हालत बेहद कमजोर है। अंतिम संस्कार का इंतजाम भी नहीं हो सका है। इसके बाद समाज के जरिए पूरा सहयोग कराया गया। हम सरकार को कहना चाहते हैं कि कोरोना के बाद हालात बिगड़े हैं। हजारों-लाखों परिवार तंग हाल हैं। सरकार के स्तर पर मदद जरूरी है।

करीब 6 हजार से ज्यादा खर्च
अंतिम संस्कार में करीब 5 से 6 हजार रुपए लग जाते हैं। 5 क्विंटल लकड़ी ही करीब 5 हजार रुपए में मिलती है। लकड़ी बेचने वालों का कहना है कि लकड़ी के भाव ऊपर-नीचे होते रहते हैं। फिर भी कोई गरीब आता है तो उसकी रेट कम कर देते हैं। लेकिन कुछ लोग अपनी लाचारी सबके सामने बता भी नहीं पाते हैं।

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