आंदोलनों की फसल काटने वाली AAP:दो वजहों से महज 10 साल में 54 क्षेत्रीय पार्टियों से आगे निकली, अब नेशनल पार्टी बनने से एक कदम दूर
आंदोलनों की फसल काटने वाली AAP:दो वजहों से महज 10 साल में 54 क्षेत्रीय पार्टियों से आगे निकली, अब नेशनल पार्टी बनने से एक कदम दूर
2011 में इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन से निकले एक्टिविस्ट अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाई और नाम रखा- आम आदमी पार्टी। चुनाव चिन्ह मिला- झाड़ू। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 10 साल के अंदर यही पार्टी देश के दो राज्यों में क्लीन स्वीप करते हुए अपनी सरकार बना लेगी। आम आदमी पार्टी अब देश के 54 राजनीतिक दलों में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली पार्टी बन गई है। इसी के साथ आने वाले वक्त में आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय पार्टियों में शुमार होने का दावा पेश कर सकती है।
आइए बताते हैं कि आम आदमी पार्टी किस तरह अन्य क्षेत्रीय दलों से अलग है और क्षेत्रीय पार्टियों की देश में क्या पोजिशन है। स्टोरी में आगे बढ़ें, इसके पहले एक रोचक सवाल का जवाब दीजिए-
54 क्षेत्रीय दलों से आगे आम आदमी पार्टी
इलेक्शन कमीशन के सितंबर 2021 के डेटा के मुताबिक, देश में कुल 2858 रजिस्टर्ड दल हैं। चुनाव आयोग ने सिर्फ 8 पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिया है और करीब 54 राजनीतिक दलों को राज्यस्तरीय पार्टी होने की मान्यता प्राप्त है। आम आदमी पार्टी को भी राज्य स्तरीय पार्टी का ही दर्जा मिला हुआ है। वहीं 2796 ऐसी पार्टियां हैं, जो रजिस्टर्ड तो हैं, लेकिन उन्हें मान्यता हासिल नहीं है।
10 साल में सीख गई पार्टी - गिरकर उठना और उठकर चलना और आगे बढ़ना
आम आदमी पार्टी का राजनीतिक सफर 2 अक्टूबर 2012 से शुरू हुआ है और अब पार्टी अपने पॉलिटिकल करियर के 10 साल पूरे करने वाली है। AAP दिल्ली में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली थी, पार्टी ने अपना राजनीतिक डेब्यू भी दिल्ली से ही किया। साल 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले AAP ने ‘बिजली पानी आंदोलन’ चलाया। अरविंद केजरीवाल ने तब शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ धरना दिया और 14 दिनों तक भूख हड़ताल की। आम आदमी पार्टी को पहली बड़ी सफलता हाथ लगी, 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में। AAP ने 70 में से 28 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया। इसके बाद कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, लेकिन वो ज्यादा नहीं चल सकी। फरवरी, 2014 में अरविंद केजरीवाल ने पूर्ण बहुमत की सरकार ना होने की वजह से इस्तीफा दे दिया।
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार से इस्तीफा देने के बाद जोश में आकर लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया, बिना ये देखे कि पार्टी का कैडर क्या है और सामने कौन है। AAP ने 2014 लोकसभा चुनाव में देशभर में 400 उम्मीदवारों को उतारा, लेकिन इनमें से सिर्फ 4 कैंडिडेट ही जीत सके। ये चारों कैंडिडेट पंजाब से ही थे। इसने आम आदमी पार्टी को ये एहसास करा दिया कि पंजाब में AAP का भविष्य सुनहरा हो सकता है। पार्टी अपने गठन के 2 साल के अंदर ही दो राज्यों में कमाल कर चुकी थी, दिल्ली में सरकार बना चुकी थी और पंजाब में लोकसभा चुनाव में कमाल कर चुकी थी।
इसके बाद 2015 में दिल्ली में AAP ने 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। केजरीवाल सरकार ने बिजली, पानी, शिक्षा पर फोकस किया और इसे देशभर में ‘दिल्ली मॉडल ऑफ गुड गवर्नेंस’ के नाम से प्रचारित किया। 2015 से 2020 तक पार्टी ने अलग-अलग राज्यों और दूसरी इकाइयों में चुनाव लड़े, लेकिन पार्टी को सफलता नहीं मिली। 2019 लोकसभा चुनाव में भी AAP को करारी हार मिली, पार्टी दिल्ली की सभी 7 सीटें तो हारी ही, वहीं पंजाब में भी सिर्फ भगवंत मान ही जीत सके, बाकी सभी हार गए, लेकिन 2020 में आम आदमी पार्टी ने फिर चौंकाया और दिल्ली विधानसभा में फिर 70 में 62 सीटें जीतकर BJP को धूल चटा दी। बीते दिनों 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में AAP ने 4 राज्यों में दमखम से चुनाव लड़ा। पंजाब में AAP ने इतिहास रच दिया, वहीं उत्तराखंड और गोवा में भी पार्टी ने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है।
दूसरे क्षेत्रीय पार्टियों से आम आदमी पार्टी कैसे अलग?
आम आदमी पार्टी को एक बात जो खास बनाती है वो ये कि ये पार्टी किसी भी पहचान, भाषा, संस्कृति, समुदाय, जाति, धर्म, क्षेत्र से जुड़ी पार्टी नहीं है, बल्कि ये एक राष्ट्रीय आंदोलन से निकली पार्टी है, जिसमें देश के सभी हिस्सों से आए लोग शामिल हुए। पार्टी ने अपने प्रतीकों के रूप में भी महात्मा गांधी, बाबा साहेब अंबेडकर और भगत सिंह जैसी शख्सियतों को चुना है। पंजाब चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी ने अंबेडकर और भगत सिंह को और ज्यादा अहमियत दी। इसकी वजह ये है कि अंबेडकर और भगत सिंह दोनों राष्ट्रीय स्तर के नेता रहे हैं। पूरे देश के युवाओं का खासा रुझान भगत सिंह की तरफ है, तो वहीं दलित आबादी अंबेडकर से खुद को कनेक्ट करती है।
आजादी से पहले थीं दो क्षेत्रीय पार्टियां
भारत में क्षेत्रीय पार्टियों का इतिहास आजादी से भी पहले से शुरू होता है। स्वतंत्र भारत में चुनावी राजनीति की शुरुआत 1952 से होती है, लेकिन दो क्षेत्रीय पार्टियां ऐसी हैं, जो ब्रिटिश काल में ही बन चुकी थीं। ये पार्टियां हैं- शिरोमणि अकाली दल (SAD) और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC)। इसके बाद अलग-अलग राज्यों में क्षेत्र, पहचान, भाषा, संस्कृति, समुदाय, जाति और धर्म के आधार पर पार्टियों का गठन होता रहा, जो क्षेत्रीय पार्टियों में शुमार होती चली गईं। AAP के पहले DMK और AIADMK ही ऐसी 2 पार्टियां रही हैं, जिन्होंने दो राज्यों (तमिलनाडु और पुडुचेरी) में अपनी सरकार बनाई, लेकिन AAP और इन दो पार्टियों में एक बड़ा फर्क ये है कि आम आदमी पार्टी ने पहले छोटा और फिर बड़ा राज्य जीता, वहीं DMK और AIADMK ने पहले बड़े और फिर छोटे राज्य में सरकार बनाई।
बहुजन समाज पार्टी (BSP)
बहुजन समाज पार्टी का गठन 1984 में दलितों के नेता कांशीराम ने किया। BSP ने हमेशा से दलित वोट बैंक पर फोकस किया और पार्टी का जनाधार तेजी से फैला। 1993 में BSP के समर्थन से समाजवादी पार्टी ने UP में सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह। इसके बाद मायावती ने BJP के समर्थन से भी सरकार बनाई। BSP ने मायावती के नेतृत्व में 2007 में पहली बार UP में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। BSP को 2014 में राष्ट्रीय पार्टी का तमगा मिला।
समाजवादी पार्टी (SP)
देश में कई सारी क्षेत्रीय पार्टियां जनता दल से टूटकर बनीं, इनमें से ही एक है समाजवादी पार्टी। मुलायम सिंह यादव ने SP का गठन 1992 में किया। इसके बाद से पार्टी कई बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई, लेकिन पार्टी कभी किसी दूसरे प्रदेश में खास प्रभाव नहीं जमा सकी। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी की पहचान यादव जाति से जोड़कर देखी जाती है।
जनता दल यूनाइटेड (JDU)
शरद यादव के जनता दल, लोकशक्ति पार्टी और समता पार्टी को मिलाकर JDU का गठन किया गया। जॉर्ज फर्नांडिस इसके फाउंडर थे। शरद यादव फिलहाल RJD में हैं और JDU के नेता नीतीश कुमार बिहार के CM हैं। पार्टी ने बिहार में अपना अच्छा खासा जनाधार बनाया और NDA गठबंधन के साथ सरकार बनाई। वहीं JDU अरुणाचल प्रदेश में भी मुख्य विपक्षी पार्टी है, लेकिन वहां कभी सत्ता में शामिल नहीं हो सकी।
तृणमूल कांग्रेस (TMC)
1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर TMC का गठन किया। 2011 में पहली बार TMC के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 227 सीटें जीतकर सरकार बनाई। 2016 में TMC को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला। पार्टी त्रिपुरा, गोवा, असम में फैलने की कोशिश कर रही है, लेकिन बहुत कोशिशों को बावजूद TMC बंगाल के बाहर अब तक किसी भी राज्य में सत्ता के करीब आती हुई नहीं दिख रही है।
शिवसेना
महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज है। CM उद्धव ठाकरे की सरकार कांग्रेस-NCP के समर्थन से चल रही है। शिवसेना का गठन 1966 में बाल ठाकरे ने किया था। शिवसेना का बेस महाराष्ट्र के अलावा गोवा समेत दूसरे राज्यों में भी है। महाराष्ट्र में शिवसेना ने पहली बार 1995 में सरकार बनाई। इसके बाद शिवसेना ने लंबे वक्त तक BJP के साथ गठबंधन में सरकारें चलाईं। शिवसेना भी कभी महाराष्ट्र के अलावा दूसरे राज्यों में सत्ता काबिज करने की स्थिति में नहीं आ सकी। इसलिए इसकी छवि हमेशा एक क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर रही है।
ऑल इंडिया अन्ना द्रविड मुनेत्र कड़गम (AIADMK)
AIADMK द्रविडियन पार्टी है, ये DMK से ही टूटकर बनी। एम करुणानिधि ने 1972 में MG रामचंद्रन को पार्टी से निकाल दिया, जिसके बाद MGR ने AIADMK का गठन किया। तमिलनाडु में पार्टी MGR के नेतृत्व में 1980 में पहली बार सत्ता में आई। वहीं पुडुचेरी में पार्टी 1974 में ही सत्ता में आ चुकी थी। AIADMK की जे जयललिता 6 बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। DMK और AIADMK दोनों ही पार्टियां तमिलनाडु और पुडुचेरी के बाहर प्रभाव नहीं डाल सकीं, इसलिए इन क्षेत्रीय पार्टियों को कभी राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उभरते हुए नहीं देखा गया।
द्रविड मुनेत्र कड़गम (DMK)
DMK दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु और पुडुचेरी की क्षेत्रीय पार्टी है। फिलहाल तमिलनाडु में स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK की कांग्रेस गठबंधन सरकार है। वहीं पुडुचेरी विधानसभा में DMK मुख्य विपक्षी पार्टी है। DMK का गठन 1949 में अन्नादुरई ने किया था। पार्टी गठन के करीब 20 साल बाद पहली बार तमिलनाडु में DMK की सरकार बनी। इसके पहले यहां कांग्रेस का ही राज कायम था। 1969 में ही पुडुचेरी मे भी DMK की सरकार बनी। इसके बाद पुडुचेरी और तमिलनाडु दोनों राज्यों में बदल-बदल कर DMK और AIADMK की सरकारें आती रहीं।
तेलगू देशम पार्टी (TDP)
TDP आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की पार्टी है। इस पार्टी का गठन 1982 में एनटी रामाराव ने किया था। 1983 में एनटी रामाराव आंध्र के CM बने। TDP के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू हैं और वे सत्ता से बाहर चल रहे हैं। TDP आंध्र प्रदेश में 3 बार सत्ता में आ चुकी है, लेकिन अब तक पार्टी दूसरे राज्यों में अपना प्रभाव नहीं दिखा सकी है, इसलिए इसे आंध्र की ही क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर देखा जाता है।
बीजू जनता दल (BJD)
1997 में नवीन पटनायक ने अपने पिता बीजू पटनायक के नाम पर बीजू जनता दल का गठन किया। 1998 के लोकसभा चुनाव में ही पार्टी ने 9 सीटें जीतीं और नवीन पटनायक को खनन मंत्रालय मिल गया। 1999 के आम चुनाव में पार्टी को 10 सीटें मिलीं। इसके बाद 2000 में पार्टी ने ओडिशा विधानसभा में बहुमत हासिल किया। इसके बाद पार्टी ने ओडिशा को अपना मजबूत गढ़ बना लिया। 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बीच BJD ने ओडिशा की 21 में से 20 सीटें जीतीं। नवीन पटनायक लगातार 22 साल से ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं। हालांकि, ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों की तरह BJD भी दूसरे राज्यों में अपना प्रसार नहीं कर सकी और ओडिशा तक ही सीमित रही।
कैसे मिलता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा
तीन में से कोई भी एक शर्त पूरी होने पर चुनाव आयोग किसी पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा देता है।
1-कोई भी दल, जिसे चार राज्यों में राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हो।
2-पार्टी तीन अलग-अलग राज्यों में मिलाकर लोकसभा की 2% सीटें (11 सीटें) जीत ले। ये 11 सीटें तीन अलग-अलग राज्यों से होना चाहिए। 3-यदि कोई पार्टी 4 लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा या विधानसभा में चार राज्यों में 6% फीसदी वोट हासिल कर ले।
तीसरी शर्त के मुताबिक पार्टी को 4 राज्यों में कम से कम 6% वोट चाहिए होते हैं। AAP को दिल्ली में 55%, पंजाब में 42%, गोवा में 6.77% वोट मिले थे। हालांकि, उत्तराखंड में पार्टी को सिर्फ 0.3% वोट ही मिल सके। ऐसे में आगे होने वाले राज्यों में पार्टी को किसी और एक राज्य में 6% वोट हासिल करना होगा और फिर अगले लोकसभा चुनाव में कम से कम 4 सीटें जीतनी होंगी। इसके बाद राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल हो जाएगा।







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