अलवर : 500 गोवंश की परवरिश कर रहीं 40 गायें:118 साल पुरानी गोशाला की इनकम 40 लाख, दूध के लिए लगती हैं कतारें; गोमूत्र-गोकाष्ठ से भी कमाई
500 गोवंश की परवरिश कर रहीं 40 गायें:118 साल पुरानी गोशाला की इनकम 40 लाख, दूध के लिए लगती हैं कतारें; गोमूत्र-गोकाष्ठ से भी कमाई
अलवर शहर में स्टेशन रोड पर 118 साल पुरानी गोशाला प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित गोशालाओं में से एक है। यहां करीब साढ़े पांच सौ गोवंश हैं। इनमें से 40 से 42 गायें दूध देती हैं। इन दुधारू गायों से सााल भर में 40 से 42 लाख रुपए का दूध बेचा जाता है। इस पैसे से अन्य 500 गायों के रख-रखाव का खर्च चलता है। गोशाला शहर के बीच में होने के कारण यहां रोजाना करीब 70 क्विंटल तक हरा चारा दान भी आता है।
90% देसी गाय
गोशाला में 90% देसी गाय हैं। एक कूपन पर आधा लीटर दूध मिलता है। यहां पर छोटे बच्चे व बीमार लोगों को दूध देने में वरीयता दी जाती है। दूध लेने वालों की लाइन देखकर इसकी डिमांड का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कई ग्राहक तो वेटिंग में होते हैं। जब कोई यहां से दूध लेना बंद करता है तो वेटिंग वालों को मौका मिलता है। एक परिवार को 1 से 2 किलो ही दूध मिलता है। ताकि अधिक से अधिक परिवारों तक गोशाला का दूध जा सके। ग्राहकों को पहले कूपन दिया जाता है। वही कूपन रोज ग्राहक लाता है और उसे दूध दिया जाता है।
यहां के दूध का मुकाबला नहीं
गोशाला से रोजाना दूध लेने वाले एक शहरवासी ने बताया 6 से 7 साल से दूध ले रहा हूं। बच्चों के लिए बहुत अच्छा है। दूध के लिए लाइन में खड़े स्टेशन रोड निवासी चुन्नीलाल ने कहा- ढाई माह से दूध ले रहा हूं। दूध का कोई मुकाबला नहीं। संजय अग्रवाल ने कहा कि यहां का दूध श्रेष्ठ है। एक बार यहां से दूध लेना शुरू करने वाला परिवार फिर बंद नहीं करता। यहां की क्वालिटी बेहतर है।
'गोकाष्ठ' भी बना रहे





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