अलवर : 500 गोवंश की परवरिश कर रहीं 40 गायें:118 साल पुरानी गोशाला की इनकम 40 लाख, दूध के लिए लगती हैं कतारें; गोमूत्र-गोकाष्ठ से भी कमाई

 

500 गोवंश की परवरिश कर रहीं 40 गायें:118 साल पुरानी गोशाला की इनकम 40 लाख, दूध के लिए लगती हैं कतारें; गोमूत्र-गोकाष्ठ से भी कमाई




कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि राजस्थान की सबसे बड़ी गोशाला (हिंगोनिया, जयपुर) में करीब 1300 गायें मरने की कगार पर थीं। इन्हें पर्याप्त चारा नहीं मिल पा रहा था। करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए तो नगर निगम पर बकाया हो चुका था। जयपुर नगर निगम ने पिछले छह महीने से फंड ही जारी नहीं किया था। कुछ साल पहले इसी गोशाला में दर्जनों गायें मर चुकी हैं। चारा और फंड की कमी के कारण बड़ी-बड़ी गोशालाओं से ऐसी खबरें आती रहती हैं। ऐसी गोशालाओं के लिए मेवात की यह गोशाला सीख देने वाली है। 118 साल पुरानी अलवर की इस गोशाला की सालाना कमाई 40 लाख रुपए हैं। ऐसा संभव हो पा रहा है बेहतरीन मैनेजमेंट के कारण। वह मैनेजमेंट क्या है? आखिर तमाम विषम परिस्थितियों में भी गोशाला की इनकम कैसे बनी रहती है? यही सब कुछ पढ़िए इस रिपोर्ट में...।

बदहाली नहीं, खुशहाली की तस्वीर
अलवर शहर में स्टेशन रोड पर 118 साल पुरानी गोशाला प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित गोशालाओं में से एक है। यहां करीब साढ़े पांच सौ गोवंश हैं। इनमें से 40 से 42 गायें दूध देती हैं। इन दुधारू गायों से सााल भर में 40 से 42 लाख रुपए का दूध बेचा जाता है। इस पैसे से अन्य 500 गायों के रख-रखाव का खर्च चलता है। गोशाला शहर के बीच में होने के कारण यहां रोजाना करीब 70 क्विंटल तक हरा चारा दान भी आता है।

गोशाला के मुखिया से समझिए मैनेजमेंट
सार्वजनिक गोशाला के मुखिया अजय अग्रवाल ने बताया कि साल 1998 में उन्होंने चार्ज लिया था। उस समय 70 गोवंश थे। अब करीब 500 के आसपास हैं। 40 दुधारू गायों से यहां रोजाना 200 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। दूध की कीमत 60 रुपए प्रति लीटर है। शुद्ध दूध के लिए गोशाला में ग्राहकों की लाइन लगती है। गोमूत्र व गोकाष्ठ भी बिकता है। इस तरह गोशाला आत्मनिर्भर है। गोशाला को शहर के लोगों का खूब सहयोग मिलता है। रोजाना हरा चारा दान आता है। इसके अलावा आर्थिक रूप से भी लोग समय-समय पर मदद करते हैं। जनता के सहयोग से गोशाला का अच्छे से संचालन कर पाते हैं। हमारा मकसद है कि गोशाला को इतना मजबूत कर दिया जाए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से चला सके।

90% देसी गाय
गोशाला में 90% देसी गाय हैं। एक कूपन पर आधा लीटर दूध मिलता है। यहां पर छोटे बच्चे व बीमार लोगों को दूध देने में वरीयता दी जाती है। दूध लेने वालों की लाइन देखकर इसकी डिमांड का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कई ग्राहक तो वेटिंग में होते हैं। जब कोई यहां से दूध लेना बंद करता है तो वेटिंग वालों को मौका मिलता है। एक परिवार को 1 से 2 किलो ही दूध मिलता है। ताकि अधिक से अधिक परिवारों तक गोशाला का दूध जा सके। ग्राहकों को पहले कूपन दिया जाता है। वही कूपन रोज ग्राहक लाता है और उसे दूध दिया जाता है।



यहां के दूध का मुकाबला नहीं
गोशाला से रोजाना दूध लेने वाले एक शहरवासी ने बताया 6 से 7 साल से दूध ले रहा हूं। बच्चों के लिए बहुत अच्छा है। दूध के लिए लाइन में खड़े स्टेशन रोड निवासी चुन्नीलाल ने कहा- ढाई माह से दूध ले रहा हूं। दूध का कोई मुकाबला नहीं। संजय अग्रवाल ने कहा कि यहां का दूध श्रेष्ठ है। एक बार यहां से दूध लेना शुरू करने वाला परिवार फिर बंद नहीं करता। यहां की क्वालिटी बेहतर है।

'गोकाष्ठ' भी बना रहे

इस गोशाला में प्रदेश में सबसे पहले 'गोकाष्ठ' बनने लगा। गाय के गोबर की लकड़ी तैयार होती है। उसे 'गोकाष्ठ' कहते हैं। यहां प्रदेश में सबसे पहले 'गोकाष्ठ' बनाने की मशीन लगी। उससे भी गोशाला की आय बढ़ी है। अब गोबर से अगरबत्ती सहित अन्य उत्पाद बनाने की तैयारी चल रही है।

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